नामुमकिन नहीं

मैं बूंद बूंद बढ़ती हूं 

वो दरिया-दरिया बहता है

मैं मिट जाती हूं मिट्टी में

वो पत्थर काट कर चलता है

मुझे सोंख लेती है सिसकियां भी 

वो गरज कर विकराल हो जाता है

मैं धंस-धंस कर रेत में सरकती रहती हूं

वो चांद छूने को मचलता है

मैं उतरती हूं तह में सागर के

वो आकर सागर में गिर जाता है

नामुमकिन नहीं है 

सागर हो जाना हमारा

मैं बूंद-बूंद बढ़ आती हूं

तुम दरिया दरिया उतर आओ

Leave a comment