श्रमिक सारे भोर से ही
कर्मपथ पर बढ़ रहे थे
पर्वतों के बोझ को वो
पाताल में भी ढो रहे थे
कोख में धरती के वो
सांस-सांस जी रहे थे
बेधने जब पर्वतों को
लौह दैत्य गरज रहे थे
टोह में एक सांस की
टकटक सब देख रहे थे
श्वेत अश्रू धार से
देवता भी पसीज रहे थे
खोल दी जब आंख उसने
मशीन दैत्य सब ढेर हुए
एक राह बंद किए
दूसरे फिर खोल दिए
उतर गए सुरंग में स्वयं
और
बौखनाग प्रकट…