मंजिल की प्यास

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दो रोटी कमाने घर से निकला था मैं

पीछे पूरा जहां छोड़ कर आ गया

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एक हसरत थी बनूं बड़ा आदमी

पूरी हसरत हुई तो बौना रह गया

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हमसफर भी नहीं रहता उम्रभर साथ में

सफर के मकां भी क्रमशः छूटते चले गए

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घर देता है उड़ने को नया आसमां

पंख अपने ठिकाने वह रखता नहीं

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घर है मेरा आसमां से छोटा मगर

पूरे आसमां को है अंदर समेटे हुए

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जो रोटी कमाने घर से निकला था मैं

मिली रोटी तो मंजिल की प्यास बढ़ गई

क्रमशः…….