रिश्ते…हवा  

दीया क्या जलाया, बादल घिरने लगे,

बारिश भी हुई, बिजली गिरने लगी।

मचा शोर; हर तरफ धुआँ उठने लगा,

हुई साफ़ जब हवा तो सब दिखने लगे।

वो क्या थे ? अब क्यों ऐसे लगने लगे ?

बर्फ रिश्ते हुए…सब पिघलने लगे।

शमां जली ही थी, महफ़िल उठने लगी;

बाती बुझी भी नहीं, अँधेरा घिरने लगा।

मैं खुश क्या हुआ, हँसी गुम हो गई;

मौसम गुलों के बदलने लगे।

पत्ते पेड़ों से गिरकर भी खुश हैं बहुत,

अपनी मिट्टी सभी को नसीब होती नहीं।

खुशियाँ तेरे दर जो छोड़ आया था मैं,

उदासी बनकर, वही मेरे साथ आ गई।

मौसम बदल देती है मिज़ाज हवाओं के भी;

हवा को कुछ मत कहो, रुख अपना मोड़ लो।

1 thought on “रिश्ते…हवा  ”

Leave a comment